वली कंधारी एक धार्मिक व्यक्ति था जो हसन अब्दाल (अब पाकिस्तान में) नामक शहर की एक पहाड़ी पर रहता था। वह अपनी आध्यात्मिक शक्तियों के लिए जाना जाता था, लेकिन वह बहुत घमंडी और अहंकारी भी था।
गुरु नानक देव जी और भाई मरदाना उस शहर में पहुँचे। जब भाई मरदाना को प्यास लगी, तो गुरु जी ने उनसे वली कंधारी से पानी माँगने को कहा, जिसकी पहाड़ी पर ताज़े पानी का एक झरना था।
भाई मरदाना ने विनम्रता से पानी माँगा, लेकिन वली कंधारी ने मना कर दिया। उसे यह पसंद नहीं था कि गुरु नानक जी लोगों के बीच सम्मान प्राप्त कर रहे थे। भाई मरदाना लौट आए, और गुरु नानक जी ने उन्हें फिर से माँगने को कहा, लेकिन वली ने उनका उपहास करते हुए फिर इनकार कर दिया।
तब गुरु नानक देव जी ने पास पड़े एक पत्थर को हटाया। उसके नीचे से ताज़े पानी की धारा बहने लगी। लोग आश्चर्यचकित रह गए। जब वली कंधारी ने यह देखा, तो वह क्रोधित हो गया। गुस्से में उसने पहाड़ी से एक विशाल चट्टान गुरु जी की ओर लुढ़का दी।
जब वह विशाल चट्टान गिरते हुए आ रही थी, गुरु नानक जी ने शांतिपूर्वक अपना हाथ उठाया। चट्टान तुरंत रुक गई। उनकी हथेली का निशान उस पत्थर पर छप गया, जो आज भी पंजा साहिब में देखा जा सकता है।
इस दिव्य चमत्कार को देखकर, वली कंधारी का अहंकार चूर-चूर हो गया। वह नीचे आया और गुरु नानक देव जी के सामने झुक गया, विनम्रता, सत्य और दिव्य प्रेम की शक्ति को समझते हुए।
"अहंकार सत्य के आगे झुक जाता है। दिव्य हाथ हमेशा विनम्र लोगों की रक्षा करता है।"