मीरी-पीरी की स्थापना
उनका जन्म 1595 में हुआ और वे 'सिपाही संत' के नाम से जाने गए। गुरु हरगोबिंद जी ने एक छोटी सेना संगठित की और स्पष्ट किया कि अति अहिंसा केवल बुराई को प्रोत्साहित करेगी — इस प्रकार मीरी-पीरी के सिद्धांत की स्थापना हुई।
गुरु जी ने सिखाया कि निर्बल और उत्पीड़ितों की रक्षा हेतु शस्त्र धारण करना आवश्यक है। 13 वर्ष की आयु में उन्होंने श्री अकाल तख़्त साहिब की स्थापना की और दो कृपाणें — मीरी और पीरी — धारण कीं, जो लौकिक और आध्यात्मिक शक्ति का प्रतीक हैं।