भक्ति, शांति और शक्ति
उनका जन्म 1630 में हुआ और उन्होंने अपना अधिकांश जीवन भक्ति-साधना में तथा गुरु नानक की शिक्षाओं के प्रचार में बिताया। शांतिप्रिय होते हुए भी, उन्होंने अपने दादा गुरु हरगोबिंद द्वारा स्थापित सशस्त्र सिख योद्धाओं की सेना को कभी भंग नहीं किया।
उन्होंने सदैव सिखों की सैन्य भावना को प्रोत्साहित किया, किंतु मुग़ल साम्राज्य के साथ कभी सीधे सशस्त्र संघर्ष में नहीं पड़े। उन्होंने गुरु हरगोबिंद द्वारा आरंभ किए गए राष्ट्र-निर्माण के महान कार्य को जारी रखा।