बाबा बंदा सिंह बहादुर ने सिख शासन के अधीन पहला स्वतंत्र संप्रभु राज्य स्थापित किया, जिसके अपने सिक्के और मुहर थे।
श्री गोकल चंद नारंग अपनी पुस्तक 'ट्रांसफ़ॉर्मेशन ऑफ़ सिखिज़्म' में लिखते हैं कि बाबा बंदा सिंह बहादुर का व्यक्तिगत आकर्षण इतना प्रबल था कि मुगल उसे अनदेखा नहीं कर सकते थे, क्योंकि उनके निडर साहस और असाधारण वीरता ने उनके अनुयायियों को उनसे घनिष्ठ रूप से बाँध रखा था।
तथ्य यह है कि मुगल सरकार द्वारा पकड़े और मारे गए हज़ारों सिखों में से एक ने भी अपनी जान बचाने के लिए अपने धर्म का त्याग नहीं किया। इसका बहुत बड़ा श्रेय बाबा बंदा सिंह बहादुर के असाधारण चरित्र और सिख मूल्यों को जाता है।
'सियारुल-मुताख़रीन' के लेखक मुहम्मद अमीन ख़ान ने बाबा बंदा सिंह बहादुर से पूछा कि वे मुगलों के विरुद्ध युद्ध क्यों कर रहे हैं। बाबा बंदा सिंह बहादुर ने उत्तर दिया, "हर धर्म और हर देश में, जब भी मनुष्य भ्रष्ट, निरंकुश और अत्याचारी हो जाते हैं, तो परमात्मा मुझ जैसा कोड़ा भेजता है ताकि उन्हें दंड दे और सबक सिखाए"।
बाबा बंदा सिंह बहादुर ने लोहगढ़ में, जिसे पहले मुख़लिसगढ़ और मुख़लिसपुर के नाम से जाना जाता था, इसी स्थान पर पहला स्वतंत्र सिख राज्य बनाया।