जब श्री गुरु तेग बहादुर जी दिल्ली की ओर यात्रा कर रहे थे, तो गुरु जी विश्राम के लिए यहाँ रुके।
गाँव में एक जट्ट परिवार की एक वृद्ध महिला थी जो गुरु तेग बहादुर की अनुयायी थी।
उस महिला ने गुरु तेग बहादुर के लिए एक बेशकीमती दुशाला बुना था और उसे संदूक में रखा था। महिला सोचती थी कि यदि उसके गुरु सच्चे हैं तो वे स्वयं आकर अपना उपहार लेंगे।
उसकी इच्छा समझकर गुरु तेग बहादुर घोड़े पर सवार होकर पहुँचे। महिला को निश्चित नहीं था कि ये उसके गुरु हैं या नहीं, इसलिए उसने गुरु जी को एक साधारण दुशाला भेंट किया।
किंतु गुरु तेग बहादुर ने उस दुशाले को माँगा जो उसके तीसरे संदूक में कपड़ों में लिपटा रखा था।