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सिख धर्म · गुरु का मार्ग

सिख गुरु साहिबान

दस ज्योतियाँ, एक लौ
विनम्रता  ·  सेवा  ·  बलिदान  ·  साहस

सिख धर्म में गुरुओं को ज्ञान-दाता और दिव्य संदेशवाहक माना जाता है — ऐसे विश्वजनीन मार्गदर्शक जिन्होंने मनों को कट्टरता और अंधविश्वासों से मुक्त किया तथा आध्यात्मिक सरलता एवं भाईचारे पर बल दिया।

Guru Nanak Dev Ji गुरु 1

गुरु नानक देव जी

दिव्य गुण: विनम्रता  ·  गुरु 1469 से 1539 तक

गुरुओं में प्रथम एवं सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव जी थे। 20 अक्तूबर 1469 को तलवंडी (ननकाना साहिब) में जन्मे गुरु जी ने बचपन में ही पंजाबी, संस्कृत और फ़ारसी में निपुणता प्राप्त कर ली थी। उन्होंने कर्मकांड, जातिगत भेदभाव और पाखंड के विरुद्ध आवाज़ उठाई और समस्त मानवता को समान माना। उन्होंने भारत, अरब और फ़ारस में चार महान उदासियाँ (यात्राएँ) कीं और सभी समुदायों के साथ दिव्य ज्ञान बाँटा।

Guru Angad Dev Ji गुरु 2

गुरु अंगद देव जी

दिव्य गुण: आज्ञाकारिता  ·  गुरु 1539 से 1552 तक

1504 में जन्मे गुरु अंगद देव जी ने गुरमुखी लिपि को लोकप्रिय एवं मानकीकृत किया, जिसमें श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी अंकित हैं। उन्होंने बच्चों के लिए विद्यालय खोले, शारीरिक एवं आध्यात्मिक प्रशिक्षण के लिए मल्ल अखाड़े की स्थापना की, 63 सलोक रचे और गुरु का लंगर की पावन परंपरा का विस्तार किया।

Guru Amar Das Ji गुरु 3

गुरु अमर दास जी

दिव्य गुण: समानता  ·  गुरु 1552 से 1574 तक

1479 में जन्मे गुरु अमरदास जी ने जातिगत बंधनों, अस्पृश्यता और सामाजिक असमानता के विरुद्ध सक्रिय संघर्ष किया। उन्होंने अपने से मिलने आने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए गुरु का लंगर ग्रहण करना अनिवार्य बनाया। उन्होंने आनंद कारज विवाह पद्धति की स्थापना की और सती एवं परदा प्रथा को समाप्त कर महिलाओं के अधिकारों की वकालत की।

Guru Ram Das Ji गुरु 4

गुरु राम दास जी

दिव्य गुण: सेवा  ·  गुरु 1574 से 1581 तक

1534 में जन्मे गुरु रामदास जी ने पवित्र नगरी अमृतसर की स्थापना की और श्री हरिमंदिर साहिब (स्वर्ण मंदिर) के निर्माण का शुभारंभ किया। उन्होंने लावाँ की रचना की, जो सिख विवाह पद्धति का पावन आधार है।

Guru Arjan Dev Ji गुरु 5

गुरु अर्जन देव जी

दिव्य गुण: आत्म-बलिदान  ·  गुरु 1581 से 1606 तक

1563 में जन्मे गुरु अर्जन देव जी ने आदि ग्रंथ का संकलन किया और सुखमनी साहिब की रचना की। उन्होंने अमृतसर में श्री दरबार साहिब का निर्माण पूर्ण किया। धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए मुग़ल सम्राट जहाँगीर के अधीन शहादत स्वीकार कर गुरु जी सिख इतिहास के प्रथम शहीद बने।

Guru Har Gobind Ji गुरु 6

गुरु हर गोबिंद जी

दिव्य गुण: न्याय  ·  गुरु 1606 से 1644 तक

1595 में जन्मे गुरु हरगोबिंद जी ने मीरी-पीरी (आध्यात्मिक एवं लौकिक शक्ति) की अवधारणा स्थापित की और श्री अकाल तख्त साहिब का निर्माण करवाया। 'संत-सिपाही' के रूप में विख्यात, उन्होंने अत्याचार से निर्बलों की रक्षा हेतु एक सुरक्षा सेना संगठित की।

Guru Har Rai Ji गुरु 7

गुरु हर राय जी

दिव्य गुण: करुणा  ·  गुरु 1644 से 1661 तक

1630 में जन्मे गुरु हर राय जी ने अपना जीवन सिमरन, औषधीय वनस्पति चिकित्सा और सामुदायिक कल्याण के विस्तार में समर्पित किया। सिखों की सैन्य तत्परता बनाए रखते हुए भी उन्होंने शांति, करुणा और आध्यात्मिक बल पर बल दिया।

Guru Har Krishan Ji गुरु 8

गुरु हर कृष्ण जी

दिव्य गुण: पवित्रता  ·  गुरु 1661 से 1664 तक

1656 में जन्मे गुरु हर कृष्ण जी को मात्र पाँच वर्ष की आयु में गुरु गद्दी पर बिठाया गया। प्रेमपूर्वक 'बाला पीर' (बाल पैग़म्बर) कहे जाने वाले गुरु जी ने दिल्ली में चेचक महामारी के पीड़ितों की जाति-धर्म भेद किए बिना सेवा एवं उपचार करते हुए अपने प्राण न्योछावर किए।

Guru Tegh Bahadur Ji गुरु 9

गुरु तेग बहादुर जी

दिव्य गुण: शांति  ·  गुरु 1665 से 1675 तक

1621 में जन्मे गुरु तेग बहादुर जी ने आनंदपुर साहिब की स्थापना की। कश्मीरी पंडितों की धार्मिक स्वतंत्रता एवं अंतरात्मा के अधिकार की रक्षा हेतु उन्होंने दिल्ली में अपना बलिदान दिया, जिससे उन्हें 'हिंद दी चादर' (भारत की रक्षक चादर) की उपाधि मिली।

Guru Gobind Singh Ji गुरु 10

गुरु गोबिंद सिंह जी

दिव्य गुण: राजसी साहस  ·  गुरु 1675 से 1708 तक

1666 में जन्मे गुरु गोबिंद सिंह जी ने 1699 में खालसा पंथ की स्थापना की और संत-सिपाही के मूल्यों का संचार किया। 1708 में ज्योति-जोत समाने से पूर्व उन्होंने श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी को समस्त पीढ़ियों के स्थायी आध्यात्मिक मार्गदर्शक के रूप में शाश्वत गुरुता प्रदान की।

Guru Granth Sahib Ji गुरु 11

गुरु ग्रंथ साहिब जी

दिव्य ज्ञान का स्रोत  ·  गुरु 1708 से अनंत काल तक

श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी सिखों के जीवंत शाश्वत गुरु हैं। गुरमुखी लिपि में रचित इस ग्रंथ में विभिन्न धार्मिक पृष्ठभूमियों के सिख गुरुओं एवं पूज्य संतों की दिव्य वाणी संकलित है, जो सार्वभौमिक आध्यात्मिक ज्ञान का प्रतिनिधित्व करती है।

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वाहेगुरु जी का ख़ालसा, वाहेगुरु जी की फ़तेह — ख़ालसा परमात्मा का है, और विजय भी उसी की है।
— सिख अभिवादन
शहीदी
सत्य, धर्म और मानवता की सेवा में शहादत।
भक्ति
वाहेगुरु के प्रति अटूट प्रेम, आध्यात्मिक अनुशासन और समर्पण।
सेवा
निःस्वार्थ सामुदायिक सेवा और समस्त प्राणियों के प्रति विनम्र समर्पण।
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