गुरुद्वारा श्री पलाहा साहिब पुराने खैराबाद गाँव के पास स्थित है, पर अब यह अमृतसर शहर की बाहरी सीमा का हिस्सा बन चुका है।
श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी यहाँ पेड़ों से घिरे हरे-भरे वन-क्षेत्र में विश्राम के लिए आया करते थे।
अमृतसर का युद्ध एक दुर्लभ सफ़ेद बाज़ को पकड़ने से आरंभ हुआ, जो फ़ारस के बादशाह की ओर से शाहजहाँ को भेंट में मिला था। (उस समय बाज़ शाही सत्ता के प्रतीकों में से एक था।)
वैसाखी के दिन शाहजहाँ के सैनिकों की एक टुकड़ी अमृतसर के पास गुमटाला गाँव के निकट एक शाही निजी शिकारगाह में शिकार कर रही थी, उसी समय गुरु जी के कुछ सिख भी वहाँ थे।
गुरु जी के बाज़ ने फ़ारस के शाह की भेंट में मिले एक विशेष, दुर्लभ सफ़ेद बाज़ को गिरा दिया। सिखों ने उस सफ़ेद बाज़ को उठाकर बाँध लिया, यह न जानते हुए कि वह बादशाह का था। मुगल सैनिकों ने, निस्संदेह घबराहट में, बाज़ को गिरते देखा था और बादशाह के प्रिय बाज़ को खोजते हुए आ पहुँचे।