जब भाई बिधी चंद ने श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी के चुराए हुए घोड़े वापस लौटाए, तब गुरु जी राय जोध के साथ गाँव कंगर में थे।
जब बिधी चंद ने बताया कि मुगल सेना पीछा करेगी, तो गुरु हरगोबिंद यहाँ, गुरुद्वारा श्री गुरुसर साहिब भुंदर के स्थान पर आए और बाबा पीर से मिले।
गुरु हरगोबिंद ने बाबा पीर से स्थिति पर विचार किया, जिन्होंने रक्षा-व्यवस्था करने के लिए एक अच्छा स्थान सुझाया। सुझाए गए स्थान पर घना जंगल और अच्छी जल-आपूर्ति थी।
गुरु हरगोबिंद ने रात भुंदर में बिताई और अगली सुबह स्नान करके 'सतनाम वाहेगुरु' का सिमरन किया। फिर गुरु जी गुरुद्वारा श्री गुरुसर साहिब महिराज के स्थान पर गए और रक्षा-व्यवस्था तैयार की।
गुरुसर का युद्ध श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी द्वारा 1631 में महिराज के निकट लाला बेग और क़मर बेग के साथ लड़ा गया तीसरा युद्ध था। भारी असमानता के बावजूद इस युद्ध में मुगलों को पूरी तरह कुचल दिया गया।