घुड़ानी कलां श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी से जुड़ा एक महत्वपूर्ण गाँव है।
ग्वालियर से रिहा होने के बाद श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी अमृतसर की ओर जा रहे थे। जब श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी 1631 में घुड़ानी कलां पहुँचे, तो वे सबसे पहले यहीं विश्राम के लिए रुके। उस समय यहाँ एक साधु रहता था।
साधु ने गुरु हरगोबिंद को जल पिलाया और गुरु जी से आध्यात्मिक चर्चा की। गुरु हरगोबिंद ने साधु को जन्म-मरण के चक्र से मुक्त कर दिया। जब गाँव वालों ने सुना कि गुरु हरगोबिंद पधारे हैं, तो उन्होंने गुरु जी को अपने गाँव में आमंत्रित किया।
गुरु हरगोबिंद यहाँ बाबा सुर्त्या जी के घर ठहरे। गुरुद्वारा श्री हवेली साहिब को गुरुद्वारा श्री भड़ौला साहिब के नाम से भी जाना जाता है।
चूँकि गुरु हरगोबिंद के लिए लंगर की व्यवस्था हेतु कोई भोजन नहीं था, गुरु जी ने कुछ गेहूँ माँगा। बाबा सुर्त्या की पत्नी के पास चक्की के आसपास बचे कुछ दानों के सिवा कुछ न था। गुरु हरगोबिंद ने वह सूखा गेहूँ एक भड़ौले, यानी अनाज रखने के मटके, में डाल दिया, और सख़्त हिदायत दी कि ढक्कन उठाकर भीतर न झाँकें। गुरु जी ने कहा कि जब भी गेहूँ की आवश्यकता होगी, भड़ौला उसे प्रदान करेगा। कई वर्षों तक भड़ौले की तली से गेहूँ निकलता रहा