1663 में श्री गुरु तेग बहादुर जी मालवा क्षेत्र की यात्रा के दौरान गाँव राजो माजरा से होते हुए मूलोवाल पधारे।
गुरु तेग बहादुर और गुरु साहिब के साथ आए अन्य सिखों ने गाँव के तालाब के पास डेरा डाला। गुरु तेग बहादुर ने अपना घोड़ा पास के एक वृक्ष से बाँधा।
जब गुरु तेग बहादुर इस गाँव के एक कुएँ के पास पहुँचे तो गुरु जी ने पानी माँगा। ग्रामवासियों ने कहा कि कुएँ का पानी खारा है और कहीं और से पानी लाने की पेशकश की।
गुरु तेग बहादुर ने कुएँ का पानी मीठा कर दिया; जब पानी की जाँच की गई तो वह मीठा पाया गया, इसीलिए नाम पड़ा 'गुरुद्वारा श्री मीठा खूह साहिब'। वह कुआँ आज भी यहाँ मौजूद है।
गुरु तेग बहादुर ने ग्रामवासियों से नौ और कुएँ खोदने को कहा। सभी ग्रामवासियों ने गुरु जी का आशीर्वाद लिया, किंतु गाँव के चौधरी गोंदा ने गुरु जी को नमन नहीं किया। चौधरी गोंदा 'सखी सरवर पीर' का अनुयायी था, पर जब उसकी पत्नी ने उससे गुरु जी को नमन करने को कहा तो उसने गुरु तेग बहादुर से क्षमा माँगी और गुरु जी ने उसे आशीर्वाद दिया।