श्री गुरु तेग बहादुर जी गाँव जहाँगीर से राजो माजरा पधारे।
गाँव का नाम पहले माई राजो रंगारी था, क्योंकि यह गाँव रंघड़ों का था। यह गाँव मालेरकोटला के नवाब ने भेंट में दिया था।
ग्रामवासी नियमित रूप से तंबाकू का सेवन करते और मांस खाते थे। जब गुरु तेग बहादुर जी गाँव के ठीक बाहर पहुँचे तो ग्रामवासियों ने गुरु जी के पास आकर विनम्रतापूर्वक बताया कि गाँव शुद्ध स्थान नहीं है।
गुरु तेग बहादुर ने गाँव के बाहरी छोर पर डेरा डाला, जहाँ गुरुद्वारा श्री गुरु तेग बहादुर साहिब राजो माजरा स्थित है।
अगली सुबह गुरु तेग बहादुर के प्रातःस्नान के लिए पानी इकट्ठा करने गए सिखों को कहीं पानी नहीं मिला। गुरु तेग बहादुर ने अपने सिखों को पास के एक सूखे तालाब की ओर भेजा, जिसमें पानी आने लगा।