EN|हिन्दी|ਪੰਜਾਬੀ

गुरु ग्रंथ साहिब के राग

31 मुख्य राग • कुल 60 राग • गुरबाणी की दिव्य संगीत संरचना

गुरु ग्रंथ साहिब के राग

Guru Granth Sahib Ji
गुरु ग्रंथ साहिब में 31 मुख्य राग हैं, जिनमें उप-रागों सहित कुल 60 राग सम्मिलित हैं। राग भारतीय शास्त्रीय संगीत में प्रयुक्त संगीत-धुन की एक जटिल संरचना है। यह एक धुन बनाने के नियमों का समूह है, जो पाठकर्ता और श्रोताओं में एक विशेष भाव जगा सकती है। प्रत्येक राग गुरु ग्रंथ साहिब में एक अध्याय या खंड है, जिसकी शुरुआत आसा राग से होती है, और आसा राग में रचित सभी वाणियाँ इस खंड में उस गुरु या भगत के अनुसार कालक्रमानुसार मिलती हैं जिन्होंने उस राग में वाणी रची।

निम्नलिखित उन सभी साठ रागों की सूची है जिनमें गुरबाणी रची गई है, आगमन क्रम में। 1. आसा 2. गूजरी 3. गौड़ी दीपकी 4. धनासरी 5. गौड़ी पूर्बी 6. सिरी 7. माझ 8. गौड़ी गुआरेरी 9. गौड़ी 10. गौड़ी दखणी 11. गौड़ी चैती 12. गौड़ी बैरागण 13. गौड़ी पूर्बी दीपकी 14. गौड़ी मालवा 15. गौड़ी माला 16. गौड़ी माझ 17. गौड़ी सोरठ 18. आसा काफी 19. आसावरी 20. आसा आसावरी 21. देवगंधारी 22. बिहागड़ा 23. वडहंस 24. वडहंस दखणी 25. सोरठ 26. जैतसरी 27. टोडी 28. बैरारी 29. तिलंग 30. तिलंग काफी 31. सुही 32. सुही काफी 33. सुही ललित 34. बिलावल 35. बिलावल दखणी 36. गौंड 37. बिलावल गौंड 38. रामकली 39. रामकली दखणी 40. नट नारायण 41. नट 42. माली गौरा 43. मारू 44. मारू काफी 45. मारू दखणी 46. तुखारी 47. केदारा 48. भैरो 49. बसंत 50. बसंत हिंडोल 51. सारंग 52. मल्हार 53. कान्हड़ा 54. कल्याण 55. कल्याण भोपाली 56. प्रभाती 57. प्रभाती बिभास 58. बिभास प्रभाती 59. प्रभाती दखणी 60. जैजावंती

सिख संगीत में राग केवल एक भाव उत्पन्न करने हेतु प्रयोग किए जाते हैं, और ये किसी विशेष समय तक सीमित नहीं हैं। दिन के किसी भी समय राग के संगीत से भाव उत्पन्न किया जा सकता है। गुरु ग्रंथ साहिब में कुल 60 राग या धुनें हैं। प्रत्येक धुन वाणी के लिए एक विशेष भाव स्थापित करती है, जो उसमें एक गहन आयाम जोड़ती है।

1. राग आसा (ਆਸਾ)
आसा में प्रेरणा और साहस की प्रबल भावनाएँ हैं। यह राग श्रोता को सभी बहानों को त्यागकर लक्ष्य प्राप्ति हेतु आवश्यक कार्य करने का दृढ़ संकल्प और महत्वाकांक्षा प्रदान करता है। यह सफलता की उत्कट इच्छा और उत्साह की भावनाएँ जगाता है, जिनसे उत्पन्न ऊर्जा श्रोता को कठिन प्रतीत होने वाली सफलता के लिए भी भीतर से शक्ति खोजने में सक्षम बनाती है। इस राग का दृढ़ भाव सुनिश्चित करता है कि असफलता कोई विकल्प नहीं है और श्रोता को प्रेरित होने के लिए प्रोत्साहित करता है।

2. राग गूजरी (ਗੂਜਰੀ)
राग गूजरी के लिए एक उपयुक्त उपमा रेगिस्तान में अकेले खड़े उस व्यक्ति की है, जिसने अपनी दोनों हथेलियों में पानी भर रखा है। किंतु जब वह पानी धीरे-धीरे उसकी जुड़ी हथेलियों से रिसने लगता है, तभी उसे जल के वास्तविक मूल्य और महत्व का बोध होता है। इसी प्रकार गूजरी श्रोता को बीतते समय का बोध कराता है और इस तरह समय की अनमोलता को समझने में सहायक होता है। यह प्रकटीकरण श्रोता को अपनी मृत्यु और नश्वरता के प्रति सजग करता है, जिससे वह अपने शेष 'जीवन-काल' का अधिक बुद्धिमानी से उपयोग करता है।

3. राग गौड़ी दीपकी (ਗਉੜੀ ਦੀਪਕੀ)
गुरु ग्रंथ साहिब में राग गौड़ी दीपकी शीर्षक के अंतर्गत एक शबद है। इस शबद में सोहिला एक लोरी है, जो एक प्रकार की सोने-समय की कथा सुनाती है। यह राग उसी तरह ऊष्मा और सुरक्षा की भावनाएँ उत्पन्न करता है, जैसे माँ अपने बच्चे को लोरी सुनाती है। लोरियाँ परंपरागत रूप से न केवल बच्चे को सांत्वना देने के लिए, बल्कि माताओं द्वारा अपने अनुभव और ज्ञान साझा करने के साधन के रूप में भी प्रयुक्त होती थीं। इसी प्रकार यह राग श्रोता को ज्ञान और अनुभव से प्रकाशित करता है और उसे इस बोध तक ले जाता है कि सत्य पाने के लिए पहले यह जानना आवश्यक है कि हम अंधकार में हैं। यह प्रबुद्ध अवस्था श्रोता को निश्चितता, निर्भयता और भविष्य की नई आशा का अनुभव कराती है।

4. राग धनासरी (ਧਨਾਸਰੀ)
धनासरी पूर्णतः निश्चिंत होने का भाव है। यह अनुभूति हमारे जीवन में जो कुछ हमारे पास है उससे संतोष और 'समृद्धि' के भाव से उत्पन्न होती है और श्रोता को भविष्य के प्रति सकारात्मक व आशावादी दृष्टिकोण प्रदान करती है।

5. राग गौड़ी पूर्बी (ਗਉੜੀ ਪੂਰਬੀ)
गौड़ी पूर्बी में अनुभव की प्रबल भावनाओं के साथ आगे बढ़ने और अधिक प्राप्त करने की तैयारी के भाव सम्मिलित हैं। इस राग में आत्मविश्वास की भावना होते हुए भी अनिश्चितता का भाव है, क्योंकि वांछित लक्ष्य प्राप्ति हेतु हार्दिक सहायता-याचना भी है। इस राग की भावनाएँ परिस्थितियों का सुविचारित आकलन हैं, न अतिरिक्त आत्मविश्वास और न ही चरम असहायता।

6. सिरी राग (ਸਿਰੀ ਰਾਗੁ)
इस राग की नींव भारतीय शास्त्रीय संगीत की मुख्यधारा परंपराओं में रची-बसी है। सिरी राग स्वभाव से गंभीर और चिंतनशील है और ऐसा वातावरण रचता है जिसमें श्रोता को दी गई सलाह पर ध्यान देने हेतु प्रेरित किया जाता है। श्रोता (मन) को संदेश के सत्य का बोध कराया जाता है और इस 'शिक्षा' के साथ उसे विनम्रता तथा 'अर्जित' ज्ञान के साथ भविष्य का सामना करने की शक्ति दी जाती है।

7. राग माझ (ਮਾਝ)
राग माझ की रचना पंचम सिख गुरु (श्री गुरु अर्जन देव जी) ने की थी। इस राग का मूल पंजाबी लोक संगीत में है और इसका सार माझा क्षेत्र की 'औसियाँ' परंपरा — प्रियजन की वापसी की प्रतीक्षा और तड़प के खेल — से प्रेरित है। इस राग से उपजी भावनाओं की तुलना प्रायः उस माँ से की जाती है जो लंबे विछोह के बाद अपने बच्चे की वापसी की प्रतीक्षा करती है। उसे बच्चे की वापसी की आशा और प्रत्याशा है, फिर भी वह उसी क्षण उसकी वापसी की अनिश्चितता से पीड़ित भी है। यह राग अत्यंत प्रेम की भावना को जीवंत करता है, और विछोह की वेदना व पीड़ा इसे और उजागर करती है।

8. राग गौड़ी गुआरेरी (ਗਉੜੀ ਗੁਆਰੇਰੀ)
गौड़ी गुआरेरी में शांति और संयम का मिश्रण है, किंतु इस राग का भावनात्मक संदेश खुला और सत्यनिष्ठ है। भावनाओं को सीधे और अनुशासित ढंग से व्यक्त किया गया है। इस राग का संतुलित और केंद्रित स्वरूप इसकी संरचना में स्पष्ट है, क्योंकि इसका स्केल 'मध्य सप्तक' तक सीमित है।

9. राग गौड़ी (ਗਉੜੀ)
गौड़ी ऐसा भाव रचती है जिसमें श्रोता को लक्ष्य प्राप्ति हेतु अधिक प्रयास करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। किंतु इस राग द्वारा दिया गया प्रोत्साहन अहंकार को नहीं बढ़ने देता। इस प्रकार यह ऐसा वातावरण रचती है जिसमें श्रोता को प्रोत्साहित तो किया जाता है, किंतु अभिमानी और आत्ममुग्ध होने से रोका भी जाता है।

10. राग गौड़ी दखणी (ਗਉੜੀ ਦਖਣੀ)
गौड़ी दखणी का स्वभाव गौड़ी से मिलता-जुलता है; किंतु इस राग की दक्षिण भारतीय शैली, जिसमें ताल भी सम्मिलित है, गौड़ी के अनुशासित व दृढ़ पहलू को अधिक उजागर करती है।

11. राग गौड़ी चेती (ਗਉੜੀ ਚੇਤੀ)
गौड़ी चेती जानबूझकर भय की अनुभूति उत्पन्न करती है, यह सचेत कराते हुए कि यदि हम उन वस्तुओं को खो दें जिन्हें हम सहज मानते हैं तो क्या हो सकता है। यह राग श्रोता को उस चेतावनी की उपेक्षा किए जाने पर संभावित परिणामों से अवगत कराकर घबराहट और पश्चाताप के भाव जगाता है।

12. राग गौड़ी बैरागणि (ਗਉੜੀ ਬੈਰਾਗਣਿ)
जैसा कि नाम से स्पष्ट है, गौड़ी 'बैरागणि' वियोग की व्यथा (बैराग) का राग है। श्रोता को गहन दुःख और शून्यता की अनुभूति होती है। किंतु गौड़ी का संतुलन सुनिश्चित करता है कि यह हानि व दुःख की भावना श्रोता को यह जानने का प्रयास करने के लिए प्रेरित करे कि वास्तव में क्या खो गया है। इस प्रकार गौड़ी बैरागणि दुःख की भावनाएँ जगाती है, जो अवसाद उत्पन्न करने के बजाय एक शिक्षा बन जाती हैं।

13. राग गौड़ी पूर्बी दीपकी (ਗਉੜੀ ਪੂਰਬੀ ਦੀਪਕੀ)
इस राग का स्वर आत्म-मूल्यांकन और सुधार के सकारात्मक दृष्टिकोण का है। यह आत्मविश्वास और अनुभव के साथ निरंतर प्रगति का वातावरण रचता है, साथ ही स्थायी उपलब्धि के प्रति सकारात्मक विश्वास भी स्थापित करता है।

14. राग गौड़ी माझ (ਗਉੜੀ ਮਾਝ)
गौड़ी माझ एक सुनियोजित भावनात्मक 'क्रिया' है, जो राग द्वारा उत्पन्न तड़प को पूर्ण करने हेतु प्रयासरत है। यह तड़प राग माझ के पश्चाताप, आशा और प्रत्याशा के समान है, किंतु इस स्थिति में यह जानबूझकर श्रोता को उस लालसा के प्रति प्रतिक्रिया देने हेतु उकसाने के लिए रची गई है।

15. राग गौड़ी मालवा (ਗੌੜੀ ਮਾਲਵਾ)
गौड़ी मालवा पंजाबी लोक संगीत पर आधारित है और पंजाब के 'मालवा' क्षेत्र तथा वहाँ की मालवाई आतिथ्य-परंपरा से प्रभावित है। इस राग की प्रकृति की तुलना एक सच्चे मित्र द्वारा दी गई विचारपूर्ण, अत्यंत गंभीर, फिर भी करुणामयी सलाह से की जा सकती है। यह राग श्रोता को ऐसे सत्य और मित्रता के साथ मनाता है कि असहमत होना असंभव हो जाता है, भले ही श्रोता को दी जा रही सलाह पसंद न आए।

16. राग गौड़ी माला (ਗਉੜੀ ਮਾਲਾ)
गौड़ी माला का सार अच्छे, शुद्ध, सत्य और सकारात्मक विचारों का एक-एक करके संयोजन है। इसमें कठिन परिश्रम करने का भाव और बढ़ी हुई ऊर्जा है, जो सत्य के प्रति अधिक भक्ति को प्रोत्साहित करती है।

17. राग गौड़ी सोरठि (ਗਉੜੀ ਸੋਰਠਿ)
गौड़ी सोरठि में एक निश्चित आकर्षण और मोहकता का भाव है, जो श्रोता का ध्यान विषय-वस्तु या लक्ष्य की ओर आकृष्ट करता है। किंतु आकर्षित और मोहित होने की भावनाएँ कर्तव्य और उस चेतावनी का पालन करने की आवश्यकता के बोध से संतुलित हैं।

18. राग आसा काफी (ਆਸਾ ਕਾਫੀ)
आसा काफी का स्वभाव निश्चिंत और आत्मविश्वासी है। यह अपने दृष्टिकोण में आश्वस्त है और किसी झूठी आशा को नहीं थामता। असीम ऊर्जा की भावनाएँ, पूर्व अनुभवों से प्राप्त आत्मविश्वास के साथ, श्रोता के लिए एक प्रेरणादायक वातावरण रचती हैं।

19. राग आसावरी (ਆਸਾਵਰੀ)
आसावरी में वास्तविक ऊर्जा और उत्साह का वातावरण है, जो श्रोता को आवश्यक कार्य पूर्ण करने हेतु प्रोत्साहित करता है। किंतु इस राग का भाव सच्चा है और इसमें अपनी परिश्रमी प्रकृति को दिखावे के रूप में प्रस्तुत करने का कोई दिखावा नहीं है।

20. राग आसा आसावरी (ਆਸਾ ਆਸਾਵਰੀ)
आसा आसावरी साहस, प्रेम और आत्मविश्वास के साथ अपने वांछित लक्ष्य को प्राप्त करने का आश्वासन देती है। यह आत्मविश्वास, सकारात्मकता और ऊर्जा के संचार के साथ निर्धारित परिणाम प्राप्ति की एक सटीक दिशा है। इस राग की प्रकृति श्रोता में सामर्थ्य की प्रबल भावना उत्पन्न करना है, ऊर्जा को इस सकारात्मकता को दोहराने की प्रेरणा के साथ जुनून में बदलना। इस राग की शक्ति व्यक्तित्व का सर्वोत्तम निचोड़ निकालती है और व्यक्ति को विचारों को कार्य में बदलने हेतु आवश्यक ज्ञान प्रदान करती है।

21. राग देवगंधारी (ਦੇਵਗੰਧਾਰੀ)
देवगंधारी उपलब्धि प्राप्त करने से उत्पन्न संतोष की भावना व्यक्त करती है। ये भावनाएँ श्रोता को अधिक करने का सामर्थ्य देती हैं और आलस्य के किसी भी भाव को क्षीण करती हैं। यह संतोष की स्थिति परम प्रसन्नता और तृप्ति की है, जो श्रोता को स्वर्ग में होने का अनुभव कराती है।

22. राग बिहागड़ा (ਬਿਹਾਗੜਾ)
बिहागड़ा का भाव अत्यंत दुःख और पीड़ा का है, जिससे शांति और समझ पाने की आवश्यकता उत्पन्न होती है। दुःख की यह उच्च भावनात्मक स्थिति केवल सत्य और अर्थ की लालसा से ही वश में आती है।

23. राग वडहंसु (ਵਡਹੰਸੁ)
वडहंसु पंजाबी लोक संगीत पर आधारित है और 'घोड़ियाँ', 'सुहाग' तथा 'अलाहुणियाँ' की परंपराओं में रचा गया है। इस राग से उपजी भावनाओं की तुलना विवाह के दिन दुल्हन की भावनाओं से की जा सकती है; वह प्रसन्न भी है और दुःखी भी। यद्यपि वह अपने वर के पास जा रही है, जो उसे आशा और आनंद से भर देता है, फिर भी वह अपने परिवार को छोड़ने पर दुःखी भी है।

24. राग वडहंसु दखणी (ਵਡਹੰਸੁ ਦਖਣੀ)
इस राग का भाव राग वडहंसु से अत्यंत मिलता-जुलता है, किंतु इसकी दक्षिण भारतीय अभिव्यक्ति शैली के कारण यह अपनी प्रकृति में अधिक अनुशासित है।

25. राग सोरठि (ਸੋਰਠਿ)
सोरठि किसी वस्तु में इतने प्रबल विश्वास की भावना व्यक्त करता है कि आप उस अनुभव को बार-बार दोहराना चाहते हैं। वस्तुतः यह निश्चितता का भाव इतना प्रबल है कि आप स्वयं वह विश्वास बन जाते हैं और उस विश्वास को जीते हैं। सोरठि का वातावरण इतना शक्तिशाली है कि अंततः सबसे उदासीन श्रोता भी आकर्षित हो जाता है।

26. राग जैतसरी (ਜੈਤਸਰੀ)
जैतसरी किसी के बिना जीवित न रह पाने की हार्दिक भावना व्यक्त करता है। इसका भाव निर्भरता की भावनाओं और उस व्यक्ति के साथ होने की तीव्र लालसा में लीन है।

27. राग टोडी (ਟੋਡੀ)
टोडी में ज्ञान और विनम्रता दोनों सम्मिलित हैं। इन्हीं भावों के माध्यम से यह राग उन बातों को सरल ढंग से समझाने का दृष्टिकोण अपनाता है जिनसे हम अवगत तो होते हैं, किंतु जिन पर विचार करने में असफल रहते हैं। यह राग श्रोता का ध्यान इन बातों पर चिंतन करने की ओर आकृष्ट करता है और ऐसे विश्वास के साथ स्पष्टीकरण देता है कि हम सहमत होने को बाध्य हो जाते हैं।

28. राग बैराड़ी (ਬੈਰਾੜੀ)
बैराड़ी उस कार्य को सुधारने और जारी रखने का भाव जगाती है जो पहले ही सिद्ध हो चुका है। यह एक अटल विश्वास है कि जो प्राप्त किया गया है वह सत्य और सकारात्मक है, जो अगले चरण की ओर बढ़ने की भूख और इच्छा को जन्म देता है। उपलब्धि में अपार आत्मविश्वास होते हुए भी, इस उपलब्धि में कोई अहंकार या दंभ नहीं है।

29. राग तिलंग (ਤਿਲੰਗ)
तिलंग प्रभावित करने के कठिन प्रयास के भाव से भरपूर है, किंतु इस भाव के साथ कि किए गए प्रयास की सराहना नहीं हुई। फिर भी इसका वातावरण क्रोध या नाराज़गी का नहीं, बल्कि उदासीन चिंतन का है, क्योंकि जिसे प्रभावित करने का प्रयास किया जा रहा है वह अत्यंत प्रिय है।

30. राग तिलंग काफी (ਤਿਲੰਗ ਕਾਫੀ)
तिलंग की तरह, इस राग में भी किसी को प्रभावित करने का प्रयास करते समय उस प्रयास की सराहना न होने का भाव है। किंतु राग तिलंग के विपरीत, यहाँ व्यक्ति इस भाव से विचलित नहीं होता। यह भिन्नता उस व्यक्ति के प्रति गहन प्रेम से उत्पन्न होती है, जो व्यक्ति को स्वीकृति की स्पष्ट कमी पर क्रुद्ध होने से रोकती है।

31. राग सूही (ਸੂਹੀ)
सूही ऐसी भक्ति की अभिव्यक्ति है जिसमें श्रोता अत्यंत निकटता और अमर प्रेम की अनुभूति करता है। श्रोता उस प्रेम में सराबोर हो जाता है और वास्तव में यह जान पाता है कि आराधना करने का अर्थ क्या है।

32. राग सूही काफी (ਸੂਹੀ ਕਾਫੀ)
सूही काफी गहन प्रेम और सुरक्षा के भाव व्यक्त करता है, जैसे बालक और माता-पिता के बीच होता है। माता-पिता के प्रेम से घिरा हुआ एक छोटा बालक सुरक्षित और निश्चिंत अनुभव करता है। यह प्रेम इतना प्रबल है कि कोई चिंता शेष नहीं रहती और व्यक्ति को इस सुरक्षा से एक विशेष आत्मविश्वास प्राप्त होता है।

33. राग सूही ललित (ਸੂਹੀ ਲਲਿਤ)
सूही ललित में भावनात्मक दृढ़ संकल्प के भाव हैं। किंतु इसमें एक अस्थिर विशेषता भी है, कि यद्यपि इन भावनाओं में प्रेम है, फिर भी लक्ष्य प्राप्ति हेतु सीमा लांघने की इच्छा भी विद्यमान है।

34. राग बिलावल (ਬਿਲਾਵਲ)
बिलावल किसी लक्ष्य की प्राप्ति या उद्देश्य की सिद्धि से उत्पन्न अपार प्रसन्नता की भावनाएँ व्यक्त करता है। यह पूर्णता, संतोष और आनंद की एक अभिभूत करने वाली अनुभूति है, जो तब अनुभव होती है जब उपलब्धि आपके लिए अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रिय हो। अनुभव की गई प्रसन्नता खुलकर हँसने जैसी है, इसमें कोई योजना या छिपा हुआ उद्देश्य नहीं है; यह उपलब्धि के भाव से उत्पन्न हार्दिक प्रसन्नता की एक स्वाभाविक अभिव्यक्ति मात्र है।

35. राग बिलावल दखणी (ਬਿਲਾਵਲ ਦਖਣੀ)
यह राग ऊर्जा से परिपूर्ण है, जो दक्षिण भारतीय अभिव्यक्ति शैली की तीव्र लय और गायन से प्रकट होती है। बिलावल दखणी की भावनाएँ आत्मविश्वास और प्रसन्नता की हैं, जो असंभव को प्राप्त करने से उत्पन्न होती हैं।

36. राग गोंड (ਗੋਂਡ)
गोंड विजय की अभिव्यक्ति है, किंतु ये भावनाएँ संतुलित और यथोचित हैं, जो विनम्रता के एक पहलू को भी सुनिश्चित करती हैं। इसलिए, यद्यपि उपलब्धि को जानने और समझने का भाव है, किंतु उपलब्धि से ही ग्रस्त होने या उसमें खो जाने की भावना नहीं है।

37. राग बिलावल गोंड (ਬਿਲਾਵਲ ਗੋਂਡ)
बिलावल गोंड में साहस और दृढ़ विश्वास की भावनाएँ सम्मिलित हैं। इस राग द्वारा रचा गया वातावरण अमूर्त प्रसन्नता का है, किंतु यह नियंत्रण खोने से बचने हेतु पर्याप्त अनुशासित भी है। यह राग अंतर्दृष्टि और विचारपूर्ण रणनीति के साथ अपनी भावनाओं को मार्मिकता से व्यक्त करता है। यह आत्मविश्वास और प्रसन्नता की भावनाएँ व्यक्त करता है, किंतु बिना किसी अभिमान के।

38. राग रामकली (ਰਾਮਕਲੀ)
रामकली की भावनाएँ एक बुद्धिमान गुरु द्वारा अपने शिष्य को अनुशासित करने के समान हैं। शिष्य सीखने की पीड़ा से अवगत है, किंतु फिर भी इस तथ्य के प्रति सचेत है कि अंततः यह उसके हित में ही है। इस प्रकार रामकली उस परिवर्तन को व्यक्त करती है, जो हमें ज्ञात हर वस्तु से उस वस्तु की ओर ले जाता है जिसके बेहतर होने का हमें विश्वास है।

39. राग रामकली दखणी (ਰਾਮਕਲੀ ਦਖਣੀ)
रामकली दखणी द्वारा उत्पन्न भावनाएँ पुराने से नए की ओर परिवर्तन की हैं, और यह विश्वास है कि यह परिवर्तन लाभप्रद है। इन भावनाओं को दक्षिण भारतीय ताल और अभिव्यक्ति शैली द्वारा उजागर और बल दिया गया है।

40. राग नट नारायण (ਨਟ ਨਾਰਾਇਨ)
नट नारायण में शीघ्रता और अधैर्य के भाव सम्मिलित हैं, किंतु साथ ही स्थिरता और नियंत्रण भी विद्यमान है। यद्यपि इस राग में नियंत्रण है, फिर भी यह प्रभाव बना रहता है कि यह असंतुलित है और किसी भी क्षण डगमगा सकता है।

41. राग नट (ਨਟ)
नट उग्र और अनियंत्रित होने का आभास रचता है और अपने भाव में चरम प्रतीत होता है। यह नियंत्रण से बाहर और कगार पर होने का भाव व्यक्त करता है, किंतु फिर नियंत्रण और स्थिरता को पुनः स्थापित करते हुए कगार से लौट आता है, जिससे राहत की भावना उत्पन्न होती है। यह राग इस प्रकार सस्पेंस की भावनाएँ रचने में अपनी दक्षता का उपयोग करता है।

42. राग माली गौड़ा (ਮਾਲੀ ਗਉੜਾ)
माली गौड़ा एक ऐसे विशेषज्ञ के आत्मविश्वास को व्यक्त करता है, जिसका ज्ञान उसके दृष्टिकोण और कार्यों दोनों में स्वतः स्पष्ट है। यह ज्ञान अनुभव से सीखा गया है और इसलिए एक 'शांत' वातावरण रचता है। किंतु यह 'शांति' का भाव सच्ची प्रसन्नता का एक पहलू है, क्योंकि आपने विशेषज्ञता और कौशल से चीजों को संभालना सीख लिया है।

43. राग मारू (ਮਾਰੂ)
मारू परंपरागत रूप से युद्ध की तैयारी में रणभूमि में गाया जाता था। इस राग की प्रकृति आक्रामक है, जो परिणामों की परवाह किए बिना सत्य को व्यक्त करने और उस पर बल देने की आंतरिक शक्ति और सामर्थ्य उत्पन्न करती है। मारू की प्रकृति निर्भयता और शक्ति व्यक्त करती है, जो सुनिश्चित करती है कि सत्य बोला जाए, चाहे इसकी कोई भी कीमत क्यों न चुकानी पड़े।

44. राग मारू काफी (ਮਾਰੂ ਕਾਫੀ)
यद्यपि मारू काफी अपनी प्रकृति में बलपूर्ण और स्पष्टवादी है, फिर भी यह अपनी भावनाओं को मधुर और मोहक ढंग से व्यक्त करता है। यह राग अपनी प्रकृति में असमझौतावादी है, फिर भी अपने सहज और आत्मविश्वासी दृष्टिकोण से श्रोता को जीतने की क्षमता और आकर्षण रखता है। एक श्रोता के रूप में, यह आपको सुनने के लिए तत्पर बनाता है, भले ही भाव कठोर और सीधे क्यों न हों।

45. राग मारू दखणी (ਮਾਰੂ ਦਖਣੀ)
मारू दखणी सत्य और यथार्थ के भावों को असमझौतावादी और स्पष्टवादी ढंग से व्यक्त करता है, जिसे दक्षिण भारतीय अभिव्यक्ति शैली और ताल द्वारा बल दिया गया है।

46. राग तुखारी (ਤੁਖਾਰੀ)
तुखारी आत्मा की उस प्रबल महत्वाकांक्षा को व्यक्त करता है जो मन के समक्ष सृष्टिकर्ता की महानता उजागर करना चाहती है। यह लक्ष्य आत्मा के लिए सर्वोपरि महत्व रखता है और इसलिए वह हार नहीं मानेगी, भले ही हठी मन उदासीन हो। यह राग आत्मा के अपने लक्ष्य पर केंद्रित रहने को दर्शाता है, अपना संदेश मन तक सीधे पहुँचाकर और फिर एक कोमल दृष्टिकोण अपनाकर। इस राग की भावनाएँ आत्मा की मन को अपनी प्रबुद्धता की योजना का अनुसरण करने और इस प्रकार अकाल (परमात्मा) से एक हो जाने हेतु मनाने की प्रबल लालसा से अभिभूत हैं।

47. राग केदारा (ਕੇਦਾਰਾ)
केदारा आत्मा की सच्ची प्रकृति और स्वभाव का बोध मन को कराता है। यह ईमानदारी, सत्यनिष्ठा और सच्चाई की भावनाओं को व्यावहारिक और देखभाल भरे ढंग से व्यक्त करता है। यह दृष्टिकोण आत्मा के स्वभाव को उजागर करता है और स्मरणीय है, ताकि मन को बिना किसी संशय के जागरूक किया जा सके।

48. राग भैरउ (ਭੇਰੳ)
भैरउ आत्मा की सृष्टिकर्ता के प्रति आस्था और हार्दिक भक्ति का प्रतीक है। यह एक प्रकार का उत्कट समर्पण है, जिसमें अन्य किसी वस्तु के प्रति जागरूक या चिंतित न होने का भाव है। व्यक्त भावनाएँ संतोष की हैं और एक अटल विश्वास या आस्था में लीन होने की हैं। इस राग में आत्मा उस प्रसन्नता को मन तक पहुँचा रही है जो मन इस भक्ति में सम्मिलित होने पर अनुभव कर सकता है।

49. राग बसंतु (ਬਸੰਤੁ)
बसंतु ऋतु परिवर्तन और वसंत की नवीनता को दर्शाता है। यह राग मन को अपने स्वार्थ को झाड़ देने के लिए प्रेरित करता है, ठीक वैसे ही जैसे वसंत की सफ़ाई सभी जाले हटाकर नई शुरुआत करती है। इसमें आशा और नई शुरुआत तथा नए चक्र के आरंभ की प्रत्याशा के भाव हैं। किंतु ये भावनाएँ ऋतु के भौतिक परिवर्तन पर निर्भर नहीं हैं, बल्कि परिवर्तन के आंतरिक प्रयास का प्रोत्साहन हैं।

50. राग बसंतु हिंडोल (ਬਸੰਤੁ ਹਿੰਡੋਲ)
बसंतु हिंडोल नई शुरुआत की ताज़गी और प्रसन्नता व्यक्त करता है और उस प्रकार के संतोष को व्यक्त करता है, जो परिवर्तन लाने हेतु कठिन परिश्रम से उत्पन्न होता है। यह राग आशा से परिपूर्ण है और सहजता तथा संतुष्टि का भाव रचता है, क्योंकि एक नया अध्याय आरंभ हो रहा है।

51. राग सारंग (ਸਾਰੰਗ)
सारंग की प्रकृति सुखदायी है और यह मन की सुलगती स्वार्थपरता व नकारात्मक प्रवृत्ति को बुझाने की क्षमता रखता है। सारंग की भावनाएँ आत्मा के शुद्ध और सच्चे विचारों को व्यक्त कर मन की जलती इच्छाओं को शांत करती हैं। यह एक सकारात्मक और तृप्तिदायक परिवर्तन है।

52. राग मलार (ਮਲਾਰ)
मलार आत्मा से मन तक यह दर्शाने का संचार है कि शीतल और तरोताज़ा कैसे हुआ जाए। मन सदैव अपने लक्ष्यों को शीघ्र और बिना प्रयास प्राप्त करने की इच्छा में जलता रहता है, किंतु इस राग में व्यक्त भावनाएँ मन में संयम और तृप्ति ला सकती हैं। यह मन को इस शांति में लाने में सक्षम है, संतोष और तृप्ति की भावना लाते हुए।

53. राग कानड़ा (ਕਾਨੜਾ)
कानड़ा एक ऐसे व्यक्तित्व से अभिभूत होने की भावनाएँ जगाता है, जो इतना प्रभावशाली है कि उसके बारे में सोचना बंद करना कठिन हो जाता है। व्यक्त व्यक्तित्व में एक चुंबकत्व है, जो आपको उसे अपना मानने पर विवश करता है और अपने असाधारण गुणों व दृष्टिकोण से आपको जीत लेने में सक्षम है।

54. राग कल्याण (ਕਲਿਆਨ)
कल्याण की प्रकृति बलपूर्ण, फिर भी लचीली है। यह किसी वस्तु की इच्छा और उसे किसी भी उपाय से प्राप्त करने के दृढ़ संकल्प को व्यक्त करता है। अपनी इच्छा में दृढ़ होते हुए भी, कल्याण कभी सुविधाजनक दृष्टिकोण अपनाता है और कभी आक्रामक दृष्टिकोण, अपने लक्ष्य तक पहुँचने के लिए। इस राग में दृढ़, बलपूर्ण, फिर भी प्रेरक चरित्र है, जिसके माध्यम से यह अपनी इच्छा पूर्ण करता है।

55. राग कल्याण भोपाली (ਕਲਿਆਨ ਭੋਪਾਲੀ)
कल्याण भोपाली की प्रकृति सीधी और आग्रहपूर्ण है। कल्याण की भाँति, यह राग भी अपनी इच्छाओं की पूर्ति हेतु दृढ़ संकल्प का भाव व्यक्त करता है। किंतु इसके विपरीत यह अपने दृष्टिकोण में लचीला नहीं है, क्योंकि वांछित लक्ष्य को सीधे और अनुशासित ढंग से संभाला जाता है। इसमें कोई हिचकिचाहट नहीं है और यह केवल अपने लक्ष्य पर केंद्रित है।

56. राग प्रभाती बिभास (ਪ੍ਰਭਾਤੀ ਬਿਭਾਸ)
प्रभाती बिभास मन और आत्मा के बीच समझौते के भाव व्यक्त करता है; मन की स्वार्थपरता और आत्मा की भक्ति के बीच एक सामान्य समझ विकसित होती है। रचा गया वातावरण प्रातःकाल की शांति और स्थिरता जैसा है, साथ ही दिन के उद्घाटन की तैयारी का भाव भी है। 'पड़ताल' ताल उस विधि परिवर्तन का प्रतिनिधित्व करता है, जो समझौते से प्रेरित है, किंतु यह एकाग्रता के संतुलन को भी उजागर करता है।

57. राग प्रभाती (ਪ੍ਰਭਾਤੀ)
प्रभाती में व्यक्त भावनाएँ प्रगाढ़ भक्ति की हैं; जिसके प्रति यह समर्पित है, उसके लिए एक तीव्र विश्वास और प्रेम है। यह स्नेह ज्ञान, सामान्य बुद्धि और गहन अध्ययन से उत्पन्न होता है। इसलिए उस सत्ता के प्रति समर्पण की एक समझ और सुविचारित इच्छा है।

58. राग प्रभाती दखणी (ਪ੍ਰਭਾਤੀ ਦਖਣੀ)
प्रभाती दखणी की प्रकृति प्रभाती से अत्यंत मिलती-जुलती है, सिवाय इसके कि भक्ति के भाव अधिक अनुशासित हैं। यह अनुशासन इस राग की दक्षिण भारतीय अभिव्यक्ति शैली से उत्पन्न होता है।

59. राग बिभास प्रभाती (ਬਿਭਾਸ ਪ੍ਰਭਾਤੀ)
बिभास प्रभाती का चरित्र आत्मविश्वासी है और इसमें एक निश्चितता का भाव है, जो जागरूकता से प्राप्त ज्ञान से उत्पन्न होता है। यह सीखने से प्राप्त वह प्रज्ञा व्यक्त करता है, जो संतोष को प्रेरित करती है। किंतु यह प्रज्ञा अभिमानी नहीं, बल्कि अपने अनुनय में कोमल है, क्योंकि इसमें इस ज्ञान को 'दिखाने' की आवश्यकता नहीं, बल्कि इसे साझा करने की इच्छा है, ताकि प्राप्तकर्ता सीख सके।

60. राग जैजावंती (ਜੈਜਾਵੰਤੀ)
जैजावंती उपलब्धि की प्रसन्नता और संतोष का भाव व्यक्त करता है, किंतु साथ ही यह हानि की वेदना भी व्यक्त करता है। इस राग हेतु एक उपयुक्त उपमा उस राजा की है जो युद्ध जीतता है, किंतु फिर उसे बताया जाता है कि उसका पुत्र रणभूमि में वीरगति को प्राप्त हो गया। यह राग यह भाव व्यक्त करता है कि आपकी आंतरिक भावनाएँ चाहे जो भी हों, कर्तव्य को सर्वप्रथम रखना पड़ता है। आनंद और शोक की यह द्वंद्वात्मकता आपको स्थिर बनाए रखने और अपनी ही उपलब्धि में लिप्त होने से रोकने में सहायक है।

यह पृष्ठ साझा करें