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मूल मंत्र
सिख धर्मशास्त्र का मूल श्लोक एवं परम सार
श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी का प्रारंभिक पाठ

मूल मंत्र को समझना

The Mool Mantar

मूल मंत्र श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी की आरंभिक रचना है, जिसे गुरु नानक देव जी ने ज्ञान-प्राप्ति के समय संक्षिप्त रूप में प्रकट किया। यह उस एक परम सत्ता में मूल आस्था को व्यक्त करता है, जो समस्त सृष्टि में व्याप्त है।

मूल मंत्र का प्रत्येक शब्द ईश्वरीय चेतना के एक गुण को उजागर करता है, जो मानवता को आध्यात्मिक जागरूकता, सत्य और सार्वभौमिक भाईचारे की ओर मार्गदर्शन करता है।

इक

एक (इक) ही सत्य है, जो सब कुछ का मूल और स्रोत है। सृष्टि शून्य से उत्पन्न नहीं हुई। जब कुछ भी नहीं था, तब भी वह एक — इक — विद्यमान था।

ओंकार

जब इक सृजनात्मक सिद्धांत का रूप लेता है, तो वह ओंकार बन जाता है। ओंकार दृश्य और अदृश्य दोनों रूपों में प्रकट होता है। सृजनकर्ता सृष्टि से पृथक नहीं है, बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि में अखंड रूप — 'कार' — में सदा विद्यमान है।

सतनाम

इक का आधारभूत सिद्धांत सतनाम है — सत्य नाम, सत्य नाम।

कर्ता पुरख

इक ओंकार सब कुछ का, सम्पूर्ण दृश्य-अदृश्य घटनाओं का, सृजनकर्ता और कर्ता है। यह मात्र कोई नियम या प्रणाली नहीं, बल्कि एक पुरख — एक सत्ता — है।

निरभउ

वह इक ओंकार किसी भी भय से रहित है, क्योंकि उसके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है।

निरवैर

वह इक ओंकार किसी भी वैर से रहित है, क्योंकि उसके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है।

अकाल मूरति

वह इक ओंकार काल (अकाल) से परे है, फिर भी विद्यमान है। यह एक ऐसा स्वरूप (मूरति) है, जो काल में सीमित नहीं है।

अजूनी

वह इक ओंकार संकुचित होकर किसी जन्म में नहीं आता। जन्म और मृत्यु की समस्त प्रक्रियाएँ उसी के भीतर घटित होती हैं।

सैभं

वह इक ओंकार स्वयं ही अपने आप से अस्तित्व में है। इसका कारण उससे पूर्व या परे कुछ और नहीं है।

गुरप्रसादि

वह इक ओंकार स्वयं को गुरु नामक माध्यम से अभिव्यक्त करता है, और यह केवल उसकी अपनी कृपा और दया (प्रसाद) से ही संभव होता है।

मूल मंत्र के बारे में

मूल मंत्र सिख धर्म की सबसे महत्वपूर्ण रचना है, जिसका प्रमाण यह है कि यह गुरु ग्रंथ साहिब का आरंभिक पाठ है। सिखों का विश्वास है कि गुरु ग्रंथ साहिब वाहेगुरु का वचन है और अचूक है।

"मूल" शब्द का अर्थ है "प्रमुख", "जड़" या "मुख्य", और "मंत्र" का अर्थ है "दिव्य उच्चारण" या "पवित्र श्लोक"। इन दोनों को मिलाकर इसका अर्थ हुआ "मुख्य मंत्र" या "मूल श्लोक"।

मूल मंत्र गुरु नानक देव जी द्वारा लगभग 30 वर्ष की आयु में ज्ञान-प्राप्ति के समय उच्चारित पहली रचना है। यह सिख धर्मशास्त्र के संपूर्ण सार को संक्षिप्त रूप में समाहित करता है।

इसका मानव अस्तित्व के लिए धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक, तार्किक, शौर्य-संबंधी और शाश्वत महत्व है। यह परम सत्ता की एक सच्ची मानवतावादी और वैश्विक अवधारणा है, जिसे सभी लोग समझ और सराह सकते हैं।

जपजी साहिब का शेष भाग इसी मूल मंत्र का विस्तार है, और सम्पूर्ण गुरु ग्रंथ साहिब, जो 1430 पृष्ठों में फैला है, मूल मंत्र का ही विस्तृत विवरण है।

Mool Mantar Artwork
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