मूल मंत्र श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी की आरंभिक रचना है, जिसे गुरु नानक देव जी ने ज्ञान-प्राप्ति के समय संक्षिप्त रूप में प्रकट किया। यह उस एक परम सत्ता में मूल आस्था को व्यक्त करता है, जो समस्त सृष्टि में व्याप्त है।
मूल मंत्र का प्रत्येक शब्द ईश्वरीय चेतना के एक गुण को उजागर करता है, जो मानवता को आध्यात्मिक जागरूकता, सत्य और सार्वभौमिक भाईचारे की ओर मार्गदर्शन करता है।
मूल मंत्र सिख धर्म की सबसे महत्वपूर्ण रचना है, जिसका प्रमाण यह है कि यह गुरु ग्रंथ साहिब का आरंभिक पाठ है। सिखों का विश्वास है कि गुरु ग्रंथ साहिब वाहेगुरु का वचन है और अचूक है।
"मूल" शब्द का अर्थ है "प्रमुख", "जड़" या "मुख्य", और "मंत्र" का अर्थ है "दिव्य उच्चारण" या "पवित्र श्लोक"। इन दोनों को मिलाकर इसका अर्थ हुआ "मुख्य मंत्र" या "मूल श्लोक"।
मूल मंत्र गुरु नानक देव जी द्वारा लगभग 30 वर्ष की आयु में ज्ञान-प्राप्ति के समय उच्चारित पहली रचना है। यह सिख धर्मशास्त्र के संपूर्ण सार को संक्षिप्त रूप में समाहित करता है।
इसका मानव अस्तित्व के लिए धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक, तार्किक, शौर्य-संबंधी और शाश्वत महत्व है। यह परम सत्ता की एक सच्ची मानवतावादी और वैश्विक अवधारणा है, जिसे सभी लोग समझ और सराह सकते हैं।
जपजी साहिब का शेष भाग इसी मूल मंत्र का विस्तार है, और सम्पूर्ण गुरु ग्रंथ साहिब, जो 1430 पृष्ठों में फैला है, मूल मंत्र का ही विस्तृत विवरण है।