6 अगस्त 1665 को श्री गुरु तेग बहादुर जी बाबा बकाला से कीरतपुर साहिब जाते हुए विश्राम के लिए यहाँ रुके।
माता नानकी, माता गुजरी, भाई मक्खन शाह, भाई कृपाल चंद (गुरु के साले) और अन्य सिख भी गुरु तेग बहादुर के साथ थे। गुरु तेग बहादुर ने बाबा बकाला, अमृतसर, थल, तरन तारन, खडूर साहिब, गोइंदवाल, सुल्तानपुर, करतारपुर, जालंधर, पलाही, फगवाड़ा, हकीमपुर, बंगा होते हुए नवांशहर की यात्रा की।
गुरु तेग बहादुर यहाँ 5 माह 19 दिन सिखी का प्रचार करते हुए ठहरे। गुरु साहिब सुबह-शाम दीवान सजाते थे। संगतें गुरु तेग बहादुर के दर्शन के लिए दूर-दूर से आती थीं। माता गुजरी लंगर तैयार करती थीं।
गुरु तेग बहादुर ने इस क्षेत्र का नाम 'नीमाशहर' से बदलकर 'नवांशहर' कर दिया। गुरु तेग बहादुर ने एक कुआँ बनवाया जिसका उपयोग लंगर तैयार करने और गुरु तेग बहादुर के स्नान के लिए जल देने में होता था। वह कुआँ आज भी मौजूद है। यहाँ से गुरु तेग बहादुर दुर्गापुर और अन्य गाँवों से होते हुए कीरतपुर गए।
यह गुरुद्वारा नवांशहर शहर में गुरुद्वारा श्री मंजी साहिब नवांशहर से 400 मीटर की दूरी पर स्थित है।