श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी गाँव लिट्टरां से लेहल कलां पधारे।
उस समय आसपास का क्षेत्र घनी झाड़ियों और वृक्षों से ढका था। ग्रामवासियों ने गुरु हरगोबिंद का स्वागत नहीं किया।
कुछ देर विश्राम के बाद गुरु हरगोबिंद ने प्रस्थान की तैयारी की। करहा मल नामक एक ग्रामीण ने सुना कि गुरु हरगोबिंद पास ही हैं, और वह गुरु हरगोबिंद की सेवा करने तथा भोजन-पानी देने पहुँचा।
गुरु हरगोबिंद करहा मल की सेवा से प्रसन्न हुए और कहा कि करहा के बर्तन (कड़ाहे) सदा भरे रहेंगे, अर्थात् वह समृद्ध होगा।
गुरु हरगोबिंद ने बताया कि इस स्थान पर की गई पहली प्रार्थना अनसुनी रह जाएगी और उसके बाद की प्रार्थनाएँ सुनी जाएँगी। ग्रामवासियों ने इसे सत्य पाया।