श्री गुरु तेग बहादुर जी मैसर खाना गाँव से निकलकर पंधेर आए और दोपहर बाद पहुँचे। गुरु साहिब ने ग्रामीणों से पूछा कि वे कहाँ विश्राम कर सकते हैं, और उनमें से एक ने मज़ाक में एक ग़रीब कुम्हार के घर की ओर इशारा किया और कहा कि मुसाफ़िर वहीं ठहरते हैं।
इस अशिष्टता की ओर ध्यान दिए बिना गुरु तेग बहादुर जी अली शेर गाँव की ओर आगे बढ़ गए। बाद में जब पंधेर के मुखिया को पता चला कि क्या हुआ था और वह यात्री कौन था, तो वह पश्चाताप से भर गया। बुज़ुर्गों ने कुछ डली गुड़ और कुछ धन भेंट के रूप में जुटाया और क्षमा माँगने अली शेर कलां की ओर चल पड़े।
रास्ते में उन्हें एक व्यक्ति मिला जो गुरु साहिब को प्रणाम करके लौट रहा था, और उन्होंने उससे पूछा कि क्षमा पाने के लिए उन्हें क्या भेंट करना चाहिए। उसने उत्तर दिया कि कुछ भी ज़रूरी नहीं है — गुरु तेग बहादुर जी दयालु हैं, और दूसरों की भूलों की ओर नहीं देखते। ग्रामीणों ने भेंटें आपस में बाँट लीं और खाली हाथ गुरु साहिब के पास गए।