युद्ध-स्थल: वह ऐतिहासिक स्थान जहाँ 7/22 दिसंबर 1704 को चमकौर के दूसरे युद्ध के दौरान सबसे भीषण लड़ाई हुई।
यह स्थान उस क़िलेनुमा दो-मंज़िला “गढ़ी” को चिह्नित करता है जो राय जगत सिंह और रूप चंद ने दिसंबर 1705 में आनंदपुर साहिब छोड़ने और सरसा नदी पार करने के बाद गुरु गोबिंद सिंह जी और उनके साथी सिखों के लिए उपलब्ध कराई थी…
वह ठीक स्थान जहाँ गुरु गोबिंद सिंह जी चमकौर साहिब पहुँचकर 6 दिसंबर 1705 (6 पोह 1761 बिक्रमी) की शाम को सबसे पहले उतरे
चमकौर का पहला युद्ध, जो 15 जनवरी 1703 (16 माघ 1759 बिक्रमी) को लड़ा गया, जब गुरु गोबिंद सिंह जी और खालसा की एक छोटी टुकड़ी ने दो शाही सेनापतियों—सैयद बेग और अलिफ़ ख़ान—से लोहा लिया, जिन्हें भड़काया गया था…
यह गुरुद्वारा 7–8 दिसंबर 1705 (7–8 पोह) की रात गुरु गोबिंद सिंह जी के रणनीतिक पलायन की स्मृति में है।