यह गुरुद्वारा 7–8 दिसंबर 1705 (7–8 पोह) की रात गुरु गोबिंद सिंह जी के रणनीतिक पलायन की स्मृति में है। घिरी हुई गढ़ी से भाई दया सिंह, भाई धर्म सिंह और भाई मान सिंह के साथ निकलकर गुरु जी इस टीले पर चढ़े और मुगल सेना को भ्रमित करने के लिए ज़ोर से ताली बजाकर "पीर-ए-हिंद" की घोषणा की
तीनों साथियों ने अलग-अलग स्थानों से वैसी ही पुकारें लगाईं, जिससे शत्रुओं में भ्रम फैल गया और गुरु जी चमकौर साहिब से सुरक्षित निकल सके
पंजाबी शब्द “तड़ी” (या “ताड़ी”) का शाब्दिक अर्थ “ताली” है, जो गुरु जी की प्रस्थान-घोषणा के उस अविस्मरणीय क्षण का द्योतक है