श्री गुरु तेग बहादुर जी जनवरी 1666 में आनंदपुर साहिब से यहाँ पधारे और वर्तमान गुरुद्वारे के स्थान पर दो दिन ठहरे, जहाँ उस समय एक तालाब था।
स्थानीय परंपरा के अनुसार आसपास के बाईस गाँव जवादा गोत्र के किसानों ने बसाए थे, जिनका मुखिया तिरलोका बैरागी साधु माधो दास का अनुयायी था। तिरलोका अहंकारी था और उसने गुरु साहिब और सिखों पर कोई ध्यान नहीं दिया। किंतु दुर्गू नामक एक विनम्र व्यक्ति ने गुरु तेग बहादुर जी की बड़ी श्रद्धा और भक्ति से सेवा की।
तिरलोका को चाँदी की जूतियाँ पहने गुज़रते देखकर गुरु साहिब ने संगत से पूछा कि वह कौन है और कहा कि उस व्यक्ति में समझ की कमी है — क्योंकि पद और आडंबर, सेवा की ओर मुड़े हृदय के सामने कुछ भी नहीं तौलते।